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सांझ पड़े जलाशय के किनारे ही देवमूर्तियों की आरती उतारी जाती है और फिर उनकी झांकी मंदिर लौट आती है।
आकर्षक 'डोल' (झूले) में भगवान चूंकि नगर भ्रमण पर निकलते हैं तो इसे डोल ग्यारस कहा जाता है।
यह दिन परिवर्तनी या जलझूलनी एकादशी भी कहलाता है, 'परिवर्तनी' इसलिए क्योंकि शैय्या पर निद्रा में लेटे भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं।
यह एकादशी 'पद्मा एकादशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से भी जानी जाती है।
जन्म के बाद 11 वें दिन जब माता यशोदा ने श्रीकृष्ण का जलवा पूजन किया तो उसके पश्चात order soma best store online ही उनकी संस्कार शिक्षा शुरू हुई।
चूंकि एकादशी पर गोकुल में उत्सव मना था तो उसी प्रकार आज भी कई स्थानों पर इस दिन मेले और झांकियों का आयोजन किया जाता है।
डोल ग्यारस पर भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा भी की जाती है क्योंकि इसी दिन राजा बलि से भगवान विष्णु ने वामन रूप में उनका सर्वस्व मांग लिया था।
बलि की भक्ति से प्रसन्ना होकर भगवान ने उसे मनचाहा वर दिया था, इसी वजह इसे 'वामन एकादशी भी कहते हैं।
इस एकादशी व्रत को करने से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है।
इस दिन भगवान विष्णु और उनके अवतार श्रीकृष्ण के दर्शन सौभाग्य प्रदान करते हैं।
धर्म ग्रंथों के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी के दिन व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
भूलवश हुए अपराधों के नाश के लिए इस व्रत से बढ़कर कोई उपाय नहीं है।
जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं।
इस व्रत के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर से कहा है कि जो इस दिन कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे भगवान की कृपा पाते हैं।
जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया, अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
यह भी मान्यता है कि डोल ग्यारस का व्रत रखे बगैर जन्माष्टमी का व्रत पूर्ण नहीं होता है और इसलिए जिन्होंने जन्माष्टमी का व्रत किया है वे डोल ग्यारस का व्रतर खकर भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करते हैं।
डोल ग्यारस के दिन भगवान विष्णु का विधि-विधान के साथ पूजन करें।
भगवान के वामन अवतार की लीला या उनकी कथा का श्रवण करें।
इस दिन चावल, दही एवं चांदी का दान उत्तम माना जाता है।
इस व्रत की कथा सुनने से मनुष्य अपने सभी अपराधों से मुक्त हो पाता है।
जन्माष्टमी व्रत के फल की प्राप्ति के लिए ग्यारस का व्रत करना जरूरी माना जाता है।
इस व्रत को करने वालों को रात्रि जागरण अवश्य करना चाहिए और भगवान भजन करना चाहिए।